श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 303: कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.303.1-2 
जनमेजय उवाच
किं तद् गुह्यं न चाख्यातं कर्णायेहोष्णरश्मिना।
कीदृशे कुण्डले ते च कवचं चैव कीदृशम्॥ १॥
कुतश्च कवचं तस्य कुण्डले चैव सत्तम।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे ब्रूहि तपोधन॥ २॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - हे महामुनि! वह कौन-सा रहस्य था जो भगवान सूर्य ने कर्ण को नहीं बताया? उसके कुण्डल और कवच क्या थे? हे तपस्वी! कर्ण को कुण्डल और कवच कहाँ से मिले? मैं यह सुनना चाहता हूँ, कृपा करके मुझे बताइए।॥ 1-2॥
 
Janamejaya asked - O great gentleman! What was the secret that Lord Surya did not reveal to Karna? What were his earrings and armor? O ascetic! From where did Karna get the earrings and armor? I want to hear this, please tell me kindly.॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)