श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय  »  श्लोक d1-d4
 
 
श्लोक  3.302.d1-d4 
(कर्णस्तु बुबुधे राजन् स्वप्नान्ते प्रवदन्निव।
प्रतिबुद्धस्तु राधेय: स्वप्नं संचिन्त्य भारत॥
चकार निश्चयं राजन् शक्त्यर्थं वदतां वर:।
यदि मामिन्द्र आयाति कुण्डलार्थं परंतप:॥
शक्त्या तस्मै प्रदास्यामि कुण्डले वर्म चैव ह।
स कृत्वा प्रातरुत्थाय कार्याणि भरतर्षभ॥
ब्राह्मणान् वाचयित्वाथ यथाकार्यमुपाक्रमत्।
विधिना राजशार्दूल मुहूर्तमजपत् तत:॥ )
 
 
अनुवाद
राजन! स्वप्न के अंत में कर्ण कुछ बोलते हुए उठा। भरतश्रेष्ठ! जागने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ राधानन्दन कर्ण ने अपने स्वप्न का मनन किया और इस प्रकार शक्ति प्राप्त करने का निश्चय किया, ‘यदि शत्रुओं को संताप देने वाले इन्द्र कुण्डल लेने के लिए मेरे पास आ रहे हों, तो मैं शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच दूँगा। भरतश्रेष्ठ! ऐसा निश्चय करके कर्ण प्रातःकाल उठकर आवश्यक कार्य करके, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर, यथासमय संध्योपासना आदि करने लगा। भरतश्रेष्ठ! फिर उसने दो घड़ी तक विधिपूर्वक जप किया।
 
Rajan! At the end of the dream, Karna woke up speaking something. India On waking up, Radhanandan Karna, the best among the speakers, contemplated on his dream and decided to seek power in this way, 'If Indra, who torments the enemies, is coming to me for the earrings, then I will give him the earrings and armor only after taking power.' Best of Bharat! Having decided this, Karna got up early in the morning, did the necessary work, recited Swastiva from the brahmins and started performing Sandhyopasana etc. at the appropriate time. The best! Then he chanted methodically for two hours.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)