श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.302.5 
भूयश्च शिरसा याचे प्रसाद्य च पुन: पुन:।
इति ब्रवीमि तिग्मांशो त्वं तु मे क्षन्तुमर्हसि॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रचण्ड किरणों वाले देव! मैं पुनः आपके चरणों में सिर झुकाकर आपसे प्रसन्न होता हूँ और आपसे बार-बार क्षमा याचना करता हूँ। इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसके लिए मुझे क्षमा करें। ॥5॥
 
O God of intense rays! I once again bow my head at your feet, please you and ask for forgiveness again and again. Please forgive me for whatever I am saying at this time. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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