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mahabharat 3.302.4: आप जानते हैं कि कर्ण मेरा प्रिय भक्त है और वह स्वर्ग में (अपने इष्ट रूप में) किसी अन्य देवता को नहीं जानता, यह जानकर भी आप मेरे हित के लिए मुझे उपदेश दे रहे हैं।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.302.4 
इष्टो भक्तश्च मे कर्णो न चान्यद् दैवतं दिवि।
जानीत इति वै कृत्वा भगवानाह मद्धितम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
आप जानते हैं कि कर्ण मेरा प्रिय भक्त है और वह स्वर्ग में (अपने इष्ट रूप में) किसी अन्य देवता को नहीं जानता, यह जानकर भी आप मेरे हित के लिए मुझे उपदेश दे रहे हैं।॥4॥
 
You know that Karna is my favorite devotee and he does not know any other god in heaven (in his Ishta form), knowing this you are giving me advice for my benefit. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)