श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.302.21 
ततस्तत्त्वमिति ज्ञात्वा राधेय: परवीरहा।
शक्तिमेवाभिकाङ्क्षन् वै वासवं प्रत्यपालयत्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
तब शत्रुओं का संहार करने वाले राधानन्दन कर्ण उस स्वप्न की घटना को सत्य जानकर शक्ति प्राप्त करने की इच्छा से इन्द्र की प्रतीक्षा करने लगे।
 
Then Radhanandan Karna, the slayer of enemies, knowing the incident of that dream to be true, started waiting for Indra with the desire to acquire power.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे द्वॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३०२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्य-कर्ण-संवादविषयक तीन सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०२॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)