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mahabharat 3.302.2: मेरी पत्नी, पुत्र, मित्र और यहाँ तक कि मेरा अपना शरीर भी मुझे आपके समान प्रिय नहीं है। हे सूर्यदेव! आप सदैव मेरी भक्ति के आश्रय हैं॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 3.302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.302.2 
न मे दारा न मे पुत्रा न चात्मा सुहृदो न च।
तथेष्टा वै सदा भक्त्या यथा त्वं गोपते मम॥ २॥
 
 
अनुवाद
मेरी पत्नी, पुत्र, मित्र और यहाँ तक कि मेरा अपना शरीर भी मुझे आपके समान प्रिय नहीं है। हे सूर्यदेव! आप सदैव मेरी भक्ति के आश्रय हैं॥ 2॥
 
My wife, son, friend and even my own body are not as dear to me as you are. O Lord of the Sun's rays! You are always the shelter of my devotion.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)