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mahabharat 3.302.18-19: इसके बाद, जप के अंत में, कर्ण ने भगवान सूर्य को अपने स्वप्न की कथा सुनाई। कर्ण ने उन्हें ठीक-ठीक बताया कि उसने क्या देखा था और रात में उनके बीच क्या बातचीत हुई थी।   |   mahabharat अध्याय 3.302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.302.18-19 
तत: सूर्याय जप्यान्ते कर्ण: स्वप्नं न्यवेदयत्॥ १८॥
यथादृष्टं यथातत्त्वं यथोक्तमुभयोर्निशि।
तत् सर्वमानुपूर्व्येण शशंसास्मै वृषस्तदा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, जप के अंत में, कर्ण ने भगवान सूर्य को अपने स्वप्न की कथा सुनाई। कर्ण ने उन्हें ठीक-ठीक बताया कि उसने क्या देखा था और रात में उनके बीच क्या बातचीत हुई थी।
 
Thereafter, at the end of the chanting, Karna narrated the story of his dream to Lord Surya. Karna narrated to him exactly what he had seen and the conversations that took place between them during the night.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)