श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.302.17 
नाहत्वा हि महाबाहो शत्रूनेति करं पुन:।
सा शक्तिर्देवराजस्य शतशोऽथ सहस्रश:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
महाबाहो! देवराज इन्द्र की वह शक्ति युद्ध में सैकड़ों और हजारों शत्रुओं को मारे बिना उनके हाथ में नहीं लौटती ॥17॥
 
Mahabaho! That power of Devraja Indra does not return to his hands without killing hundreds and thousands of enemies in the war. ॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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