श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.302.14 
स त्वमप्येनमाराध्य सूनृताभि: पुन: पुन:।
अभ्यर्थयेथा देवेशममोघार्थं पुरन्दरम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अतः तुम भी उनकी पूजा करो और बार-बार मधुर वचन बोलो तथा भगवान इन्द्र से किसी अमोघ अस्त्र की प्रार्थना करो।
 
Therefore you too should worship Him and repeatedly speak sweet words and pray to Lord Indra for some infallible weapon.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)