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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 302: सूर्य-कर्ण-संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय
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श्लोक 1
श्लोक
3.302.1
कर्ण उवाच
भगवन्तमहं भक्तो यथा मां वेत्थ गोपते।
तथा परमतिग्मांशो नास्त्यदेयं कथंचन॥ १॥
अनुवाद
कर्ण ने कहा - हे सूर्यदेव! मैं आपका अनन्य भक्त हूँ, जैसा कि आप भी मुझे जानते हैं। हे भयंकर! आपके लिए किसी भी प्रकार से कोई वस्तु अप्रदत्त नहीं है।॥1॥
Karna said - O Sun God! I am your exclusive devotee, as you also know me. O fierce one! Nothing is unpaid for you in any way.॥ 1॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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