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mahabharat 3.301.4: हे पुरुष रत्न! पिता, माता, पुत्र तथा इस संसार में जितने भी भाई-बन्धु हैं, वे सभी जीवित मनुष्यों के द्वारा ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.301: सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 301: सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.301.4 
जीवतां कुरुते कार्यं पिता माता सुतास्तथा।
ये चान्ये बान्धवा: केचिल्लोकेऽस्मिन् पुरुषर्षभ॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुष रत्न! पिता, माता, पुत्र तथा इस संसार में जितने भी भाई-बन्धु हैं, वे सभी जीवित मनुष्यों के द्वारा ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं॥4॥
 
O gem of a man! Father, mother, son and all other brothers and relatives in this world, they all achieve their goals through living men only. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)