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mahabharat 3.300.4: वैशम्पायन बोले, "हे राजनश्रेष्ठ! हे भरतवंशी! मैं आपके प्रश्न के अनुसार यह कथा कहूँगा। कृपया ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनिए।"   |   mahabharat अध्याय 3.300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.300.4 
वैशम्पायन उवाच
अहं ते राजशार्दूल कथयामि कथामिमाम्।
पृच्छतो भरतश्रेष्ठ शुश्रूषस्व गिरं मम॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन बोले, "हे राजनश्रेष्ठ! हे भरतवंशी! मैं आपके प्रश्न के अनुसार यह कथा कहूँगा। कृपया ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनिए।"
 
Vaishampayana said, "O best of kings! O jewel of the Bharata clan! I will narrate this story as per your question. Please listen to me carefully."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)