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mahabharat 3.300.33: विभावसो! लोकेश्वर! ब्रह्माजी द्वारा गाया हुआ यह प्राचीन श्लोक है कि यश ही मनुष्य का प्राण है ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.300.33 
अयं पुराण: श्लोको हि स्वयं गीतो विभावसो।
धात्रा लोकेश्वर यथा कीर्तिरायुर्नरस्य ह॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
विभावसो! लोकेश्वर! ब्रह्माजी द्वारा गाया हुआ यह प्राचीन श्लोक है कि यश ही मनुष्य का प्राण है ॥33॥
 
Vibhavaso! Lokeshwar! This is an ancient verse sung by Lord Brahma that fame is the life of a man. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)