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mahabharat 3.300.32: इस संसार में यश माता के समान मनुष्य को नवजीवन प्रदान करता है, किन्तु अपयश जीवित प्राणी का भी जीवन नष्ट कर देता है ॥32॥   |   mahabharat अध्याय 3.300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.300.32 
कीर्तिर्हि पुरुषं लोके संजीवयति मातृवत्।
अकीर्तिर्जीवितं हन्ति जीवतोऽपि शरीरिण:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में यश माता के समान मनुष्य को नवजीवन प्रदान करता है, किन्तु अपयश जीवित प्राणी का भी जीवन नष्ट कर देता है ॥32॥
 
Like a mother, fame gives new life to man in this world. But infamy destroys the life of even a living person. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)