Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.300.22: ब्राह्मण ने कहा - प्रिये! मैं सहस्र नेत्रों वाला सूर्य हूँ। स्नेहवश तुम्हें दर्शन देकर समसामयिक कर्तव्य बता रहा हूँ। कृपया मेरी सलाह स्वीकार करो। इससे तुम्हें बहुत लाभ होगा॥ 22॥ | mahabharat अध्याय 3.300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ब्राह्मण उवाच
अहं तात सहस्रांशु: सौहृदात् त्वां निदर्शये।
कुरुष्वैतद् वचो मे त्वमेतच्छ्रेय: परं हि ते॥ २२॥
अनुवाद
ब्राह्मण ने कहा - प्रिये! मैं सहस्र नेत्रों वाला सूर्य हूँ। स्नेहवश तुम्हें दर्शन देकर समसामयिक कर्तव्य बता रहा हूँ। कृपया मेरी सलाह स्वीकार करो। इससे तुम्हें बहुत लाभ होगा॥ 22॥
The Brahmin said - dear! I am the Sun with thousands of eyes. Out of affection I am giving you darshan and suggesting you the contemporary duty. Please accept my advice. This will be of great benefit to you.॥ 22॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥