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mahabharat 3.300.17: नाना प्रकार के रत्न, स्त्रियाँ, गौएँ, धन आदि देकर तथा अनेक दृष्टान्तों से मोहित करके कुण्डल मांगने वाले इन्द्र से बचना चाहिए॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 300: सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.300.17 
रत्नै: स्त्रीभिस्तथा गोभिर्धनैर्बहुविधैरपि।
निदर्शनैश्च बहुभि: कुण्डलेप्सु: पुरन्दर:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
नाना प्रकार के रत्न, स्त्रियाँ, गौएँ, धन आदि देकर तथा अनेक दृष्टान्तों से मोहित करके कुण्डल मांगने वाले इन्द्र से बचना चाहिए॥17॥
 
‘By giving away various kinds of gems, women, cows, wealth and by luring him with many examples, one should try to avoid Indra who is seeking the Kundal.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)