श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.30.9 
अनन्या हि नरव्याघ्र नित्यदा धर्ममेव ते।
बुद्धि: सततमन्वेति च्छायेव पुरुषं निजा॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! जिस प्रकार तुम्हारी छाया सदैव मनुष्य के पीछे-पीछे चलती है, उसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि भी सदैव परम भक्ति के साथ धर्म का अनुसरण करती है। 9॥
 
Male best! Just as your shadow always follows a person, in the same way your intellect always follows religion with utmost devotion. 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)