श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.30.8 
राजानं धर्मगोप्तारं धर्मो रक्षति रक्षित:।
इति मे श्रुतमार्याणां त्वां तु मन्ये न रक्षति॥ ८॥
 
 
अनुवाद
मैंने आर्यों से सुना है कि यदि धर्म की रक्षा होती है तो धर्मरक्षक स्वयं राजा की रक्षा करता है। परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि वह आपकी रक्षा नहीं कर रहा है।
 
I have heard from the Aryans that if Dharma is protected then the protector of Dharma himself protects the king. But I feel that he is not protecting you. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)