श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.30.6 
धर्मार्थमेव ते राज्यं धर्मार्थं जीवितं च ते।
ब्राह्मणा गुरवश्चैव जानन्त्यपि च देवता:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारा राज्य धर्म के लिए है, तुम्हारा जीवन भी धर्म के लिए है। ब्राह्मण, गुरु और देवता सभी इसे जानते हैं॥6॥
 
Your kingdom is for Dharma, your life is also for Dharma. Brahmins, Gurus and Gods all know this.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)