श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.30.40 
तवेमामापदं दृष्ट्वा समृद्धिं च सुयोधने।
धातारं गर्हये पार्थ विषमं योऽनुपश्यति॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! तुम्हारी दुर्दशा और दुर्योधन की समृद्धि देखकर मैं उस विधाता की निन्दा करता हूँ जो कुदृष्टि से देख रहा है, अर्थात् सज्जनों को दुःख और दुष्टों को सुख देकर ठीक से विचार नहीं कर रहा है॥40॥
 
O son of Kunti! Seeing your plight and Duryodhan's prosperity, I condemn the creator who is looking at things with an evil eye, that is, he is not thinking properly by giving pain to the virtuous and happiness to the wicked. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)