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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप
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श्लोक 4
श्लोक
3.30.4
त्वां च व्यसनमभ्यागादिदं भारत दु:सहम्।
यत् त्वं नार्हसि नापीमे भ्रातरस्ते महौजस:॥ ४॥
अनुवाद
हे भारत! इसी कारण से तुम्हें यह कठिन विपत्ति झेलनी पड़ी है, जिसके न तो तुम और न ही तुम्हारे पराक्रमी भाई ही योग्य हैं॥4॥
O Bharata! For this very reason you have also been subjected to this difficult calamity, for which neither you nor your mighty brother are worthy.॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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