श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.30.39 
आर्याञ्छीलवतो दृष्ट्वा ह्रीमतो वृत्तिकर्शितान्।
अनार्यान् सुखिनश्चैव विह्वलामीव चिन्तया॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि जो सज्जन, शीलवान और विनयशील हैं, वे तो जीविका कमाने में कष्ट पा रहे हैं; परन्तु जो दुष्ट हैं, वे सुख भोग रहे हैं; यह सब देखकर मेरी उपरोक्त धारणा दृढ़ हो रही है और मैं चिन्तित हो रहा हूँ ॥39॥
 
Because those who are noble, well behaved and modest are facing difficulties in earning their livelihood; but those who are evil are enjoying happiness; seeing all this, my above belief is strengthened and I am getting worried. ॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)