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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप
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श्लोक 34
श्लोक
3.30.34
अन्यथैव हि मन्यन्ते पुरुषास्तानि तानि च।
अन्यथैव प्रभुस्तानि करोति विकरोति च॥ ३४॥
अनुवाद
लोग भिन्न-भिन्न वस्तुओं को भिन्न-भिन्न रूपों में मानते हैं; परन्तु सर्वशक्तिमान ईश्वर उन्हें भिन्न-भिन्न रूपों में उत्पन्न और नष्ट करता है ॥ 34॥
People consider different things in different forms; but the Almighty God creates and destroys them in different forms. ॥ 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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