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mahabharat 3.30.33: जिन ऋषियों ने सत्य को देखा है, उन्होंने वस्तुओं का स्वरूप भिन्न प्रकार से देखा है; परन्तु अज्ञानियों को वे भिन्न रूप में दिखाई देती हैं। जैसे मरुस्थल पर पड़ने वाली दिव्य सूर्य की किरणें जल के समान दिखाई देती हैं ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.30.33 
अन्यथा परिदृष्टानि मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभि:।
अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वत:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जिन ऋषियों ने सत्य को देखा है, उन्होंने वस्तुओं का स्वरूप भिन्न प्रकार से देखा है; परन्तु अज्ञानियों को वे भिन्न रूप में दिखाई देती हैं। जैसे मरुस्थल पर पड़ने वाली दिव्य सूर्य की किरणें जल के समान दिखाई देती हैं ॥33॥
 
The sages who have seen the truth have seen the nature of things in a different way; but to the ignorant they appear in a different form. Just as the rays of the celestial sun falling on the desert appear as water. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)