श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.30.28 
अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मन: सुखदु:खयो:।
ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं नरकमेव च॥ २८॥
 
 
अनुवाद
यह जीव अज्ञानी है और अपने सुख-दुःख का निश्चय करने में भी असमर्थ है। यह भगवान की प्रेरणा से ही स्वर्ग और नरक में जाता है॥28॥
 
This living being is ignorant and is incapable of even determining its own happiness and sorrow. It goes to heaven and hell only on the inspiration of God.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)