श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.30.20 
अतीव मोहमायाति मनश्च परिभूयते।
निशाम्य ते दु:खमिदमिमां चापदमीदृशीम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
आपके दुःख और आपकी भयंकर विपत्ति का विचार करके मैं अत्यंत व्याकुल हो रहा हूँ और मेरा मन शोक से ग्रस्त हो रहा है ॥20॥
 
Thinking of your suffering and your terrible calamity, I am becoming extremely distraught and my mind is afflicted with sorrow. ॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)