श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.30.16 
अस्मिन्नपि महारण्ये विजने दस्युसेविते।
राष्ट्रादपेत्य वसतो धर्मस्ते नावसीदति॥ १६॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि आप अपना राज्य छोड़कर डाकुओं से सेवित इस निर्जन वन में निवास कर रहे हैं, तथापि आपके धर्म-कर्म में कभी शिथिलता नहीं आई है ॥16॥
 
Though You have left your kingdom and are residing in this desolate forest served by robbers, Your religious duties have never slackened. ॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)