श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.30.15 
इष्टय: पशुबन्धाश्च काम्यनैमित्तिकाश्च ये।
वर्तन्ते पाकयज्ञाश्च यज्ञकर्म च नित्यदा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
इष्टि (पूजा), पशुबन्ध (जानवरों को बाँधना), काम्य यज्ञ, नैमित्तिक यज्ञ, पाकयज्ञ और नित्ययज्ञ- ये सब भी आपके यहाँ नियमित रूप से होते रहते हैं। 15॥
 
Ishti (worship), Pashubandh (tying of animals), Kamya Yagya, Naimittik Yagya, Pakayagya and Nityayagya - all these also continue in your place regularly. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)