श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.30.11 
स्वाहाकारै: स्वधाभिश्च पूजाभिरपि च द्विजान्।
दैवतानि पितॄंश्चैव सततं पार्थ सेवसे॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! तुम सदैव स्वाहा, स्वधा और पूजन के द्वारा देवताओं, पितरों और ब्राह्मणों की सेवा करते हो। 11.
 
Kunti's son! You always serve the gods, ancestors and Brahmins through Swaha, Swadha and worship. 11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)