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mahabharat 3.30.1: द्रौपदी बोली - हे राजन! मैं उस ईश्वर और विधाता (भाग्य) को नमस्कार करती हूँ, जिसने आपके मन में मोह उत्पन्न किया है। अपने पिता और पितामह के आचरण का भार वहन करते हुए भी आपके विचार विपरीत प्रतीत होते हैं॥ 1॥   |   mahabharat अध्याय 3.30: दु:खसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.30.1 
द्रौपद्युवाच
नमो धात्रे विधात्रे च यौ मोहं चक्रतुस्तव।
पितृपैतामहे वृत्ते वोढव्ये तेऽन्यथा मति:॥ १॥
 
 
अनुवाद
द्रौपदी बोली - हे राजन! मैं उस ईश्वर और विधाता (भाग्य) को नमस्कार करती हूँ, जिसने आपके मन में मोह उत्पन्न किया है। अपने पिता और पितामह के आचरण का भार वहन करते हुए भी आपके विचार विपरीत प्रतीत होते हैं॥ 1॥
 
Draupadi said - O King! I salute that God and the Creator (Fate) who have created delusion in your mind. Your thoughts seem to be contrary even in bearing the burden of the conduct of your father and grandfather.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)