श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 299: शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.299.17 
यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या सावित्र्याख्यानमुत्तमम्।
स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दु:खं प्राप्नुयान्नर:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस उत्तम सावित्री कथा को सुनता है, वह सदैव सुखी रहता है; क्योंकि उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और उसे कभी दुःख नहीं होता ॥17॥
 
He who listens to this most excellent Savitri story with devotion will always be happy as all his desires will be fulfilled and will never experience sorrow. ॥ 17॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २९९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-उपाख्यानविषयक

दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९९॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)