श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 298: पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवान‍्के लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान‍्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.298.44 
मार्कण्डेय उवाच
तथा प्रशस्य ह्यभिपूज्य चैव
वरस्त्रियं तामृषय: समागता:।
नरेन्द्रमामन्त्र्य सपुत्रमञ्जसा
शिवेन जग्मुर्मुदिता: स्वमालयम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! इस प्रकार वहाँ आये हुए महर्षिगण स्त्रियों में श्रेष्ठ सावित्री की स्तुति और सत्कार करके, पुत्रसहित राजा द्युमत्सेन की अनुमति लेकर प्रसन्नता और आनन्द के साथ अपने-अपने घर चले गए॥44॥
 
Markandeyaji says- Yudhishthir! In this way, the great sages who had come there, after praising and honoring Savitri, the best among women, took the permission of King Dyumatsen along with his son and left for their respective homes with happiness and joy. 44॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २९८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-उपाख्यानविषयक

दौ सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९८॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)