श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 298: पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवान‍्के लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान‍्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना  »  श्लोक 11-13
 
 
श्लोक  3.298.11-13 
गौतम उवाच
वेदा: साङ्गा मयाधीतास्तपो मे संचितं महत्।
कौमारब्रह्मचर्यं च गुरवोऽग्निश्च तोषिता:॥ ११॥
समाहितेन चीर्णानि सर्वाण्येव व्रतानि मे।
वायुभक्षोपवासश्च कृतो मे विधिवत् पुरा॥ १२॥
अनेन तपसा वेद्मि सर्वं परचिकीर्षितम्।
सत्यमेतन्निबोधध्वं ध्रियते सत्यवानिति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले, "मैंने छहों अंगों सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन किया है। मैंने घोर तप किया है। मैंने बाल्यकाल से ही ब्रह्मचर्य का पालन करके अपने ज्येष्ठों तथा अग्निदेव को प्रसन्न किया है। मैंने एकाग्रचित्त होकर सभी व्रत पूरे किए हैं। पूर्वकाल में मैंने विधिपूर्वक वायुपान करके व्रत किए हैं। इसी तप के प्रभाव से मैं दूसरों के समस्त कार्यों को जानता हूँ। आप सब लोग मेरे वचनों पर विश्वास करें कि सत्यवान जीवित है।"
 
Gautama said, "I have studied the entire Vedas including the six parts. I have accumulated great penance. I have pleased my elders and Agnidev by observing celibacy since my childhood. I have completed all the vows with a concentrated mind. In the past, I have observed fasts by drinking air as per the prescribed method. Due to the effect of this penance, I know all the activities of others. You all should believe my words that Satyavan is alive."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)