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mahabharat 3.297.d1h-56: भद्रे! यह लो, मैंने तुम्हारे पति को त्याग दिया है। कुलनन्दिनी! तुमने अपने दानपूर्ण वचनों से मुझे पूर्णतः संतुष्ट कर दिया है। साध्वी! यह सत्यवन्नी का रोग अब कामनापूर्ति हो गया है और तुम ही इसे दूर कर सकती हो। 56.   |   mahabharat अध्याय 3.297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक d1h-56
 
 
श्लोक  3.297.d1h-56 
एष भद्रे मया मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि।
(तोषितोऽहं त्वया साध्वि वाक्यैर्धर्मार्थसंहितै:।)
अरोगस्तव नेयश्च सिद्धार्थ: स भविष्यति॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
भद्रे! यह लो, मैंने तुम्हारे पति को त्याग दिया है। कुलनन्दिनी! तुमने अपने दानपूर्ण वचनों से मुझे पूर्णतः संतुष्ट कर दिया है। साध्वी! यह सत्यवन्नी का रोग अब कामनापूर्ति हो गया है और तुम ही इसे दूर कर सकती हो। 56.
 
Bhadra! Take this, I have left your husband. Kulnandini! You have satisfied me completely with your words full of charity. Sadhvi! This disease of Satyavanni has become a wish-fulfilling and can be taken away by you. 56.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)