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mahabharat 3.297.68-69: मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तब सत्यवान् होश में आकर सुखपूर्वक सोये हुए मनुष्य के समान उठकर सम्पूर्ण दिशाओं और वनप्रदेश की ओर देखते हुए बोले - 'सुमध्यमे! मैं आपके साथ फल लाने के लिए घर से निकला था, तभी लकड़ी काटते समय मेरे सिर में भयंकर दर्द होने लगा।' 68-69।   |   mahabharat अध्याय 3.297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 68-69
 
 
श्लोक  3.297.68-69 
मार्कण्डेय उवाच
उपलभ्य तत: संज्ञां सुखसुप्त इवोत्थित:।
दिश: सर्वा वनान्तांश्च निरीक्ष्योवाच सत्यवान‍्॥ ६८॥
फलाहारोऽस्मि निष्क्रान्तस्त्वया सह सुमध्यमे।
तत: पाटयत: काष्ठं शिरसो मे रुजाभवत्॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तब सत्यवान् होश में आकर सुखपूर्वक सोये हुए मनुष्य के समान उठकर सम्पूर्ण दिशाओं और वनप्रदेश की ओर देखते हुए बोले - 'सुमध्यमे! मैं आपके साथ फल लाने के लिए घर से निकला था, तभी लकड़ी काटते समय मेरे सिर में भयंकर दर्द होने लगा।' 68-69।
 
Markandeya says - Yudhishthira! Then Satyavan, coming to his senses, got up like a man who is sleeping comfortably and looking at all the directions and the forest region said - 'Sumadhyame! I had left home with you to bring fruits, then while chopping wood I started having severe headache. 68-69.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)