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mahabharat 3.297.50: सत्पुरुषों का दान कभी व्यर्थ नहीं जाता। वहाँ न तो किसी को स्वार्थ की हानि उठानी पड़ती है और न ही मान का नाश होता है। संतों में ये तीनों (दान, धन और मान) सदैव विद्यमान रहते हैं, इसीलिए वे सम्पूर्ण जगत के रक्षक हैं ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 3.297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.297.50 
न च प्रसाद: सत्पुरुषेषु मोघो
न चाप्यर्थो नश्यति नापि मान:।
यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं
तस्मात् सन्तो रक्षितारो भवन्ति॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
सत्पुरुषों का दान कभी व्यर्थ नहीं जाता। वहाँ न तो किसी को स्वार्थ की हानि उठानी पड़ती है और न ही मान का नाश होता है। संतों में ये तीनों (दान, धन और मान) सदैव विद्यमान रहते हैं, इसीलिए वे सम्पूर्ण जगत के रक्षक हैं ॥50॥
 
The offerings of the good men never go waste. There, no one has to suffer loss of self-interest and neither is honour destroyed. These three (offerings, wealth and honour) remain constant in the saints; that is why they are the protectors of the entire world. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)