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mahabharat 3.297.42: मनुष्य को अपने पर उतना विश्वास नहीं होता जितना संतों पर होता है। इसीलिए सभी लोग संतों से विशेष प्रेम करना चाहते हैं॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 3.297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.297.42 
आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु य:।
तस्मात् सत्सु विशेषेण सर्व: प्रणयमिच्छति॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को अपने पर उतना विश्वास नहीं होता जितना संतों पर होता है। इसीलिए सभी लोग संतों से विशेष प्रेम करना चाहते हैं॥ 42॥
 
Man does not have as much faith in himself as he has in saints. That is why everyone wants to love saints especially.॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)