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mahabharat 3.297.25: सत्पुरुष द्वारा अनुमोदित अपने-अपने वर्ण के धर्म का पालन करने से सभी लोग ज्ञानमार्ग को प्राप्त होते हैं, जो सबका लक्ष्य है। अतः दूसरे या तीसरे वर्ण में जाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इसीलिए सत्पुरुष वर्ण-धर्म को ही महत्व देता है॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 3.297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 297: सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान‍्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान‍् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.297.25 
एकस्य धर्मेण सतां मतेन
सर्वे स्म तं मार्गमनुप्रपन्ना:।
मा वै द्वितीयं मा तृतीयं च वाञ्छे
तस्मात् सन्तो धर्ममाहु: प्रधानम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
सत्पुरुष द्वारा अनुमोदित अपने-अपने वर्ण के धर्म का पालन करने से सभी लोग ज्ञानमार्ग को प्राप्त होते हैं, जो सबका लक्ष्य है। अतः दूसरे या तीसरे वर्ण में जाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इसीलिए सत्पुरुष वर्ण-धर्म को ही महत्व देता है॥ 25॥
 
By following the religion of one's own Varna approved by a good person, everyone reaches the path of knowledge, which is the goal of everyone. Therefore, one should not desire to belong to another or a third Varna. That is why a virtuous person gives importance to Varna-Dharma only.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)