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mahabharat 3.296.33: धीमी गति से चलती हुई सावित्री मानो अपने हृदय को दो भागों में बाँट रही थी, एक भाग अपने पति का अनुसरण कर रहा था और दूसरा भाग प्रतिक्षण उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था ॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 3.296: सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान‍्के साथ उसका वनमें जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 296: सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान‍्के साथ उसका वनमें जाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.296.33 
अनुव्रजन्ती भर्तारं जगाम मृदुगामिनी।
द्विधेव हृदयं कृत्वा तं च कालमवेक्षती॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
धीमी गति से चलती हुई सावित्री मानो अपने हृदय को दो भागों में बाँट रही थी, एक भाग अपने पति का अनुसरण कर रहा था और दूसरा भाग प्रतिक्षण उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था ॥ 33॥
 
Savitri, walking at a slow pace, seemed to have divided her heart into two parts, with one part following her husband and with the other part waiting every moment for his death. ॥ 33॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २९६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-उपाख्यानविषयक दो सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)