Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.296.23-26: मार्कण्डेय कहते हैं - तब महान व्रत करने वाली सावित्री ने अपने सास-ससुर को प्रणाम करके कहा - 'मेरे पति फल आदि लाने के लिए महान वन में जा रहे हैं। यदि सास-ससुर मुझे अनुमति दें, तो मैं भी उनके साथ चलना चाहती हूँ। आज मैं उनका वियोग एक क्षण भी सहन नहीं कर सकती। आपके पुत्र आज अपने बड़ों के लिए तथा अग्निहोत्र के उद्देश्य से फल, फूल और लकड़ी आदि लाने के लिए वन जा रहे हैं, अतः उन्हें रोकना उचित नहीं है। हाँ, यदि वे किसी अन्य कार्य से वन जा रहे होते, तो उन्हें रोका जा सकता था। एक वर्ष से कुछ कम समय हो गया है, जब से मैं आश्रम से बाहर नहीं गई हूँ। अतः आज मैं पुष्पों से परिपूर्ण वन को देखने के लिए अत्यंत उत्सुक हूँ। | mahabharat अध्याय 3.296: सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान्के साथ उसका वनमें जाना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मार्कण्डेय उवाच
साभिवाद्याब्रवीच्छ्वश्रूं श्वशुरं च महाव्रता।
अयं गच्छति मे भर्ता फलाहारो महावनम्॥ २३॥
इच्छेयमभ्यनुज्ञाता आर्यया श्वशुरेण ह।
अनेन सह निर्गन्तुं न मेऽद्य विरह: क्षम:॥ २४॥
गुर्वग्निहोत्रार्थकृते प्रस्थितश्च सुतस्तव।
न निवार्यो निवार्य: स्यादन्यथा प्रस्थितो वनम्॥ २५॥
संवत्सर: किंचिदूनो न निष्क्रान्ताहमाश्रमात्।
वनं कुसुमितं द्रष्टुं परं कौतूहलं हि मे॥ २६॥
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं - तब महान व्रत करने वाली सावित्री ने अपने सास-ससुर को प्रणाम करके कहा - 'मेरे पति फल आदि लाने के लिए महान वन में जा रहे हैं। यदि सास-ससुर मुझे अनुमति दें, तो मैं भी उनके साथ चलना चाहती हूँ। आज मैं उनका वियोग एक क्षण भी सहन नहीं कर सकती। आपके पुत्र आज अपने बड़ों के लिए तथा अग्निहोत्र के उद्देश्य से फल, फूल और लकड़ी आदि लाने के लिए वन जा रहे हैं, अतः उन्हें रोकना उचित नहीं है। हाँ, यदि वे किसी अन्य कार्य से वन जा रहे होते, तो उन्हें रोका जा सकता था। एक वर्ष से कुछ कम समय हो गया है, जब से मैं आश्रम से बाहर नहीं गई हूँ। अतः आज मैं पुष्पों से परिपूर्ण वन को देखने के लिए अत्यंत उत्सुक हूँ।
Markandey says - Then Savitri, who was observing a great fast, bowed to her mother-in-law and father-in-law and said - 'My husband is going to the great forest to bring fruits etc. If mother-in-law and father-in-law give me permission, I too wish to go with him. Today I cannot bear his separation even for a moment. Your sons are going to the forest today to bring fruits, flowers and firewood etc. for their elders and for the purpose of Agnihotra, so it is not right to stop them. Yes, if they were going to the forest for some other work, they could have been stopped. It has been a little less than a year since I have not gone out of the ashram. Therefore, today I am very eager to see the forest full of flowers.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥