Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.295.9: द्युमत्सेन ने कहा- महाराज! हम लोग राज्य से विमुख होकर वन में शरण लिए हुए हैं और नियमपूर्वक तपस्वी जीवन व्यतीत कर रहे हैं तथा धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं। आपकी पुत्री इन सब कष्टों को सहन करने में समर्थ नहीं है। ऐसी स्थिति में वह आश्रम में रहकर वनवास का कष्ट कैसे सहन कर सकेगी?॥9॥ | mahabharat अध्याय 3.295: सत्यवान् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
द्युमत्सेन ने कहा- महाराज! हम लोग राज्य से विमुख होकर वन में शरण लिए हुए हैं और नियमपूर्वक तपस्वी जीवन व्यतीत कर रहे हैं तथा धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं। आपकी पुत्री इन सब कष्टों को सहन करने में समर्थ नहीं है। ऐसी स्थिति में वह आश्रम में रहकर वनवास का कष्ट कैसे सहन कर सकेगी?॥9॥
Dyumatsena said— Maharaj! We have been dethroned from the kingdom and have taken refuge in the forest and are leading an ascetic life with discipline and discipline and performing religious rituals. Your daughter is not capable of enduring all these hardships. In such a condition, how will she be able to endure the pain of exile while living in the ashram?॥9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥