श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 295: सत्यवान‍् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.295.14 
अभिप्रायस्त्वयं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षित:।
स निर्वर्ततु मेऽद्यैव काङ्क्षितो ह्यसि मेऽतिथि:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
परन्तु यदि मेरी यह अभिलाषा, जो मैंने आरम्भ से ही चाही थी, आज पूरी होनी है, तो अवश्य होगी। आप मेरे इच्छित अतिथि हैं॥14॥
 
But if this intention of mine, which I had desired from the beginning, is to be fulfilled today, then it must be so. You are my desired guest.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)