vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण
»
श्लोक 38
श्लोक
3.293.38
साभिवाद्य पितु: पादौ व्रीडितेव मनस्विनी।
पितुर्वचनमाज्ञाय निर्जगामाविचारितम्॥ ३८॥
अनुवाद
सावित्री को कुछ लज्जा महसूस हुई, उसने अपने पिता के चरणों में झुककर उनकी आज्ञा स्वीकार की और बिना कुछ सोचे-समझे वहाँ से चली गई।
Savitri, feeling somewhat ashamed, bowed down at the feet of her father, accepted his command and departed without thinking twice.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×