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mahabharat 3.293.35: जो पिता अपनी कन्या का विवाह विवाह योग्य होने पर नहीं करता, वह निन्दनीय है। जो पति अपनी पत्नी के मासिक धर्म के समय उसके साथ सहवास नहीं करता, वह निन्दनीय है और जो पुत्र अपनी विधवा माता की उसके पति की मृत्यु के पश्चात् रक्षा नहीं करता, वह निन्दनीय है।॥35॥   |   mahabharat अध्याय 3.293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.293.35 
अप्रदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपयन् पति:।
मृते भर्तरि पुत्रश्च वाच्यो मातुररक्षिता॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जो पिता अपनी कन्या का विवाह विवाह योग्य होने पर नहीं करता, वह निन्दनीय है। जो पति अपनी पत्नी के मासिक धर्म के समय उसके साथ सहवास नहीं करता, वह निन्दनीय है और जो पुत्र अपनी विधवा माता की उसके पति की मृत्यु के पश्चात् रक्षा नहीं करता, वह निन्दनीय है।॥35॥
 
‘A father who does not give away his daughter in marriage when she is of marriageable age is condemnable. A husband who does not have intercourse with his wife during her menstrual period is condemnable and a son who does not protect his widowed mother after the death of her husband is condemnable.’॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)