श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.293.32 
राजोवाच
पुत्रि प्रदानकालस्ते न च कश्चिद् वृणोति माम्।
स्वयमन्विच्छ भर्तारं गुणै: सदृशमात्मन:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा, "पुत्री! अब तुम्हारा विवाह किसी वर से करने का समय आ गया है, किन्तु (तुम्हारे तेज से चकित होने के कारण) कोई भी मुझसे तुम्हें नहीं मांग रहा है। अतः तुम स्वयं ही अपने समान गुणों वाले वर की खोज करो।"
 
The king said, "Daughter! Now the time has come to marry you to a groom, but (because of being amazed by your brilliance) no one is asking for you from me. Therefore you should yourself search for a groom who is equal to you in qualities." 32.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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