श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.293.31 
यौवनस्थां तु तां दृष्ट्वा स्वां सुतां देवरूपिणीम्।
अयाच्यमानां स वरैर्नृपतिर्दु:खितोऽभवत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मद्रराज अपनी दिव्य पुत्री को वयस्क होते देख अत्यन्त दुःखी हुए और अभी तक उन्होंने उसके लिए कोई वरदान नहीं माँगा था ॥31॥
 
The King of Madras was very sad to see his divine daughter entering adulthood and yet he had not yet requested for any boon for her. ॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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