श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.293.2 
द्यूते दुरात्मभि: क्लिष्टा: कृष्णया तारिता वयम्।
जयद्रथेन च पुनर्वनाच्चापि हृता बलात्॥ २॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्रों ने जुए के समय हमें बड़े संकट में डाल दिया था, परन्तु इसी द्रौपदी ने हमारी रक्षा की थी। फिर जयद्रथ ने इसी वन से इसका बलपूर्वक अपहरण कर लिया था॥2॥
 
The evil-minded sons of Dhritarashtra had put us in great trouble during gambling, but this Draupadi saved us. Then Jayadratha forcibly abducted her from this forest.॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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