श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.293.18 
उत्तरं च न ते किंचिद् व्याहर्तव्यं कथञ्चन।
पितामहनिसर्गेण तुष्टा ह्येतद् ब्रवीमि ते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इस विषय में तुम्हें किसी प्रकार का विरोध या उत्तर नहीं देना चाहिए। ब्रह्माजी की आज्ञा से संतुष्ट होकर मैं तुमसे यह कह रहा हूँ॥18॥
 
You should not give any kind of protest or reply in this matter. I am telling you this after being satisfied with the order of Brahmaji.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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