श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.293.17 
प्रसादाच्चैव तस्मात् ते स्वयम्भुविहिताद् भुवि।
कन्या तेजस्विनी सौम्य क्षिप्रमेव भविष्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे सौम्य! ब्रह्माजी की कृपा से तुम्हें शीघ्र ही इस पृथ्वी पर एक तेजस्वी कन्या प्राप्त होगी॥17॥
 
So gentle! By the blessings of Lord Brahma, you will soon get a bright girl on this earth. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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