श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.293.15 
तुष्टासि यदि मे देवि वरमेतं वृणोम्यहम्।
संतानं परमो धर्म इत्याहुर्मां द्विजातय:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे देवि! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपसे यह संतान-सम्बन्धी वर माँगता हूँ; क्योंकि द्विज जाति के लोग मुझसे सदैव कहते हैं कि 'न्यायपूर्वक संतान उत्पन्न करना भी परम धर्म है।'॥15॥
 
O Goddess! If you are pleased, then I ask you for this boon related to progeny; because the people of the twice-born caste always tell me that 'Procreation of progeny in a just manner is also the ultimate Dharma.'॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)